Saturday, 7 October 2017

कुछ क्षणिकाएँ....दीदी की डायरी से



ऐ जिंदगी 
तू सच में 
बहुत ख़ूबसूरत है…!
फिर भी तू, 
उसके बिना
बिलकुल भी 
अच्छी नहीँ लगती…!!
......
क्या हुआ अगर 
हम किसी के 
दिल में नहीं 
धड़कते, 
मगर हम
आँखों में तो 
बहुतों के खटकते हैं…
.....
‘सब्र’ 
एक ऐसी ‘सवारी’ है 
जो अपने ‘सवार’ को 
कभी गिरने नहीं देती;
ना किसी के 
‘क़दमों’ में 
और ना ही 
किसी के नज़रों ‘में’।
......
ये मोहब्बत भी 
आग जैसी है ..
लग जाये
तो बुझती नही..
और यदि…
बुझ जाये तो..
जलन होती है…!

-दीदी की डायरी से

Friday, 6 October 2017

यूँ न दिल को....श्रीमती आशा शैली

यूँ न दिल को उछालकर चलिए।
रास्ते देख-भालकर चलिए।।

वक़्त की देखिए नज़ाकत को।
ख़ुद को सांचे में ढाल कर चलिए।।

आज आना है उनको महफ़िल में।
आप दिल को सँभालकर चलिए।।

हुस्न की हैं नुमाइशें लगती।
आप ख़ुद को निखार कर चलिए।।

पार जाने की चाह हो दिल में।
नाव दरिया में डालकर चलिए।।

आपसे हम गिला नहीं करते।
आप भी बात टालकर चलिए।
-श्रीमती आशा शैली 

Thursday, 5 October 2017

चंद हाईकू...अमित जैन 'मौलिक'


मौन है हाँ है,
तुम भी तो हो जाओ
ज़ुदा ज़ुबाँ है।

पहले सीखो,
मरना सरल है
जीकर देखो।

पियो पहले,
सारी कड़वाहट 
यूँ कहाँ चले।

यह इल्ज़ाम,
कि बहने न दिया
नदी तो बनो।

अभी तुम हो,
तो बहुत कठिन
हम तो बनो।

गीली मिट्टी हूँ,
पानी नही मिलाओ
मन मिलाओ।

तेरा मेरा क्यों,
सब तो अपना है
रज़ा तो हो।

कहाँ से लाऊँ,
सुकूँ सब्र अब मैं
गुज़र तो हो।

और कितना,
सहता तो आया हूँ
और क्यों सहूँ।
-अमित जैन 'मौलिक'

Wednesday, 4 October 2017

इश्क़ के बाद में सब जुर्म हमारे निकले......परवीन शाकिर

शाम आयी तेरी यादों के सितारे निकले
रंग ही ग़म के नहीं नक़्श भी प्यारे निकले

रक्स जिनका हमें साहिल से बहा लाया था
वो भँवर आँख तक आये तो क़िनारे निकले

वो तो जाँ ले के भी वैसा ही सुबक-नाम रहा
इश्क़ के बाद में सब जुर्म हमारे निकले

इश्क़ दरिया है जो तैरे वो तिहेदस्त रहे
वो जो डूबे थे किसी और क़िनारे निकले

धूप की रुत में कोई छाँव उगाता कैसे
शाख़ फूटी थी कि हमसायों में आरे निकले
-परवीन शाकिर

अर्धनारीश्वर....लवनीत मिश्र


नर नारी का भेद केवल,
रूप रंग का भेद नहीं।
नर नारी की समानता,
आदर है,कोई खेद नहीं॥

हर नर में निहित है,
नारी सामान संवेदना।
हर नारी में निहित है,
पुरषार्थ की चेतना॥

अर्धनारीश्वर रूप है,
उदाहरण इस रूप का।
सम्मान हो एक दूजे का,
आदर हो इस स्वरूप का॥

अहंकार के जाल में,
उलझा यह समाज है।
पौरुष और नारीत्व का,
भेद ही विनाश है॥

सृष्टि के चक्र का,
यह दोनों आधार हैं।
साथ हों तो मंज़िलें,
पृथक तो बेकार हैं॥

-लवनीत मिश्र

Tuesday, 3 October 2017

चंद शेर...फ़ेहमी बदायूनी


छिपकली ने बचा लिया वरना 
रात तन्हाई जान ले लेती 
*** 
इक जनाज़े के साथ आया हूँ 
मैं किसी क़ब्र से नहीं निकला 
*** 
वहां फ़रहाद का ग़म कौन समझे 
जहां बारूद पत्थर तोड़ती है 
*** 
उसे लेकर जो गाड़ी जा चुकी है 
मैं शायद उसके नीचे आ गया हूँ 
*** 
बस वही लफ़्ज़ जानलेवा था 
ख़त में लिख कर जो उसने काटा था
*** 
शिकार आता है क़दमों में बैठ जाता है 
हमारे पास कोई जाल वाल थोड़ी है 
*** 
फूल को फूल ही समझते हो 
आपसे शायरी नहीं होगी 
*** 
तिरे मौज़े यहीं पर रह गए हैं 
मैं इनसे अपने दस्ताने बना लूँ 
*** 
नमक की रोज़ मालिश कर रहे हैं 
हमारे ज़ख़्म वर्जिश कर रहे हैं 
*** 
अदालत फ़र्शे-मक़्तल धो रही है 
उसूलों की शहादत हो गयी क्या 
फ़र्शे-मक़्तल = वध स्थल
-फ़ेहमी बदायूंनी

Monday, 2 October 2017

विधवा बनकर पेन्शन लेती....डॉ. डी.एम.मिश्रा

गाँव - गाँव हो गया भिखारी
ये कैसी माया सरकारी।

विधवा बनकर पेन्शन लेती
देखा एक सुहागन नारी।

वोट के बदले नोट मिलेगा
खुला ख़ज़ाना है सरकारी।

स्वाइन-फ्लू आ गया यहाँ भी
सूअर बाँट रहे बीमारी।

हाड़ के पीछे कुत्ते लड़ते
बीच सड़क पर मारा-मारी।

महाकुम्भ के इस मेले में
बुढ़िया गिरी, पिसी बेचारी।

मोदी हों या राहुल भैया
देश से ज़्यादा कुर्सी प्यारी।

कुछ कवि जनता का दुख गाते
कुछ गाते कविता दरबारी
-डॉ. डी.एम. मिश्रा