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Tuesday, 2 January 2018

ढाई अक्षर...रश्मि भटनागर


आज से सदियों पहले
शायद सृष्टि के समय
मैंने दिल की किताब से
कुछ अक्षर चुराये।
चोरी तो चोरी है - कभी पकड़ी ही जायेगी
घबराई सी मैं
उन अक्षरों को लेकर भटकती रही
फिर मैंने वो अक्षर
एक कली में छुपा दिए
अगले ही दिन
वो कली चटकी और फूल बनी
अब फिर डर लगा मुझे
सबको पता चल जायेगा
वहाँ से अक्षर उठा कर
मैंने फूल पर रख दिए
थोड़ी देर में ही वहाँ
भंवरे गुनगुनाने लगे
फिर वो अक्षर मैंने
चुपके से उठाये - और
आसमान में उछाल दिए
ये सब क्या हो गया
मैंने तो सिर्फ ढाई अक्षर ही चुराये थे
ये तो लाखों तारे बन गए
काश, मैं वो अक्षर अपने
दिल में ही रख लेती| 
-रश्मि भटनागर

Friday, 6 October 2017

यूँ न दिल को....श्रीमती आशा शैली

यूँ न दिल को उछालकर चलिए।
रास्ते देख-भालकर चलिए।।

वक़्त की देखिए नज़ाकत को।
ख़ुद को सांचे में ढाल कर चलिए।।

आज आना है उनको महफ़िल में।
आप दिल को सँभालकर चलिए।।

हुस्न की हैं नुमाइशें लगती।
आप ख़ुद को निखार कर चलिए।।

पार जाने की चाह हो दिल में।
नाव दरिया में डालकर चलिए।।

आपसे हम गिला नहीं करते।
आप भी बात टालकर चलिए।
-श्रीमती आशा शैली