
आज से सदियों पहले
शायद सृष्टि के समय
मैंने दिल की किताब से
कुछ अक्षर चुराये।
चोरी तो चोरी है - कभी पकड़ी ही जायेगी
घबराई सी मैं
उन अक्षरों को लेकर भटकती रही
फिर मैंने वो अक्षर
एक कली में छुपा दिए
अगले ही दिन
वो कली चटकी और फूल बनी
अब फिर डर लगा मुझे
सबको पता चल जायेगा
वहाँ से अक्षर उठा कर
मैंने फूल पर रख दिए
थोड़ी देर में ही वहाँ
भंवरे गुनगुनाने लगे
फिर वो अक्षर मैंने
चुपके से उठाये - और
आसमान में उछाल दिए
ये सब क्या हो गया
मैंने तो सिर्फ ढाई अक्षर ही चुराये थे
ये तो लाखों तारे बन गए
काश, मैं वो अक्षर अपने
दिल में ही रख लेती|
-रश्मि भटनागर

