Friday, 23 March 2018

एहसास है....एक मोहब्बत का


एहसास है....एक
मोहब्बत का  , 
महसूस किया जा सकता है
जिसे रूह से.... 
यह उस ईश्वर
की तरह है,.... जो
कण-कण में 
विद्यमान है
सृष्टि के...
प्यार,...जो 
जीवन में
सामने आता है
विभिन्न रूपों में....और यह
एहसास दिलाता है...कि
कितनी खूबसूरत है
ये जिन्दगी...

Saturday, 24 February 2018

कोई भी नहीं चाहिए प्रश्न अभी


कोई भी
नहीं चाहिए
प्रश्न अभी
घिरी हुई हूँ
अभी मैं बहुत से 
प्रश्नों से घिरी
नहीं न जीना 
चाहती मैं......ये 
छटपटाती ज़िन्दगी
पूछता ही नहीं..कोई
टकटकी फिर क्यों...
जब भी कभी..हो
लगाते...जबरन
चिपकाना पड़ता है 
मुस्कुराहट चेहरे पर
एक क्षण के लिए.....
छिपाकर आँसुओँ के..सैलाब,
काटी है भीषण रातें कई
इस दिल में....जो
तरसता है हरदम.. 
साथ के लिए..तुम्हारे

Friday, 9 February 2018

भावों की एक मीठी नदी



लगते हो मौन,
निर्विकार, एकाकी
निश्चल खड़े पहाडों की तरह
अटल ,अविचल तुम,
मैंने देखा है
तुम्हारे हृदय के अंतर्मन से 
बूँद-बूँद रिसकर
कल-कल निसृत होती है
भावों की एक मीठी नदी
को शिशु सा किलकते हुये
जिसके निर्जन तट के
आगोश में बैठकर,
सुनकर धड़कती धाराओं का
सुगम संगीत
थका मन विश्राम पाता है
भरकर अंजुरी भर जल
तुम अपनी चौड़ी हथेलियों में
मेरे रुखे,प्यासे होंठों तक लाते हो
उस मीठे,शीतल जल की
सुगंध से ही
मन की क्षुधा शांत हो जाती है
और मन के तटबंधों को
तोड़कर बहने लगती है
तुम्हारे प्रेम की शीतल नदी
जानती हो 
तुम्हारे प्रवाह में 
स्वयं के अस्तित्व को विलीन कर
सर्वस्व भूलकर बहती हुई
मैं पा लेती हूँ
जीवन नदी का अमृत जल।

Thursday, 1 February 2018

लालिमा...सा विस्तार


उभरे तुम
आकाश पे
मेरी
ज़िन्दगी के
इन्द्रधनुष से......
तुम्हारा विस्तृत प्रेम
हरा भरा कर देता
तन मन को
पुलकित.....
तुम्हारा प्रेम
खरे सोने सा 
सच्चा.....जीवन
रंग देता
स्नेह की
तुम्हारे
पीली, सुनहरी
धूप में
संग तुम्हारे पाया
जीवन में
ताना बाना बुनते
नारंगी सपनों 
का....प्रेम की 
लालिमा...सा विस्तार
इंद्रधनुषी...सपनो से
सजा-सँवरा
अपना संसार
तुम्हारे बाद
इन्द्रधनुष के 
और...रंग खो गए
बस, दूनी है... 
बैंजनी विषाद की 
छाया....
मेरी ज़िन्दगी
सूनी है...
बिन तेरे.

Friday, 26 January 2018

चंद हाईकू.....

यौवन आया
बूढ़े बरगद में
विहंसे पात
ले अंगड़ाई
कलियाँ शरमाई
आया बसंत

स्वर्ण चुनर
ओढ़ वसुधा झूमी
महकी हवा
पीने पराग
तितलियाँ मचली
लगी बौराने

अमराई में
कूक हूक सी लगी
पिक की तान
बासंती पाती
बिखरी बगिया में
मौसम संग
इन्द्रधनुष
उतरा धरा पर
करने सैर

मलज गंध
छेड़े मन के तार
बसंत आया

Wednesday, 17 January 2018

खत पर एक मासूम के बवाल था कितना...


खत पर एक 
मासूम के 
बवाल था 
कितना...
नादानी थी 
उसकी...पर 
मलाल था  
मुझे कितना....
हाथों पे
मेरे आई थी 
उतर रंगत 
उसकी...गुलाबी
चेहरे पर
गुलाल शर्म का
था कितना.....
गुज़र जाता 
हद से अगर मैं
तो मुज़रिम कहते
मुझे...और फिर
बग़ावत का भी 
उबाल दिल में
कितना था....
टूट गया
काँच सा
मगर खनक भी
न हुई कुछ
पागलपन में भी 
मुझे ख्याल..सबका  
था कितना... 
अंत इसका
सिवा मेरे 
मालूम था
हर किसी को
हाल पर मैं
अपने...खुद ही
निहाल 
कितना था....
चमक थी पूर्णिमा की  
दिखा झरोखे से
हो गया भान सा.. 
वो चाँद पावन  
कितना था.....

Friday, 12 January 2018

अलाव की चटखती लकडियों में.....

मौसम की बेरुख़ी से बेहाल
जाड़े की ठिठुरती रात में,
रेशमी गरम लिहाफ ओढ़े,
अधमुंदी पलकों से मीठे ख़्वाब 
देखने की कोशिश में 
करवटें बदलते लोग

आलीशान इमारतों की छाँव में
कच्ची मिट्टी से बनी 
झोपड़पट्टियों के बीच
जलते अलाव को घेरकर बैठे 
सुख-दुख की बातें करते
सिहरते सिकुडे़ लोग 
अलाव की चटखती लकडियों
में पिघलाते अपना ग़म

आधी रात के बाद
बुझती आग के पास
फटी कंबल को 
बदन पर कसकर लपेटे
कुनमुनाते लोग

क्यूँ नहीं बुझते शोलों से
चिंनगारियों के
एक-एक कतरे को उठाकर
अंधेरे जीवन की डगर पर
चल पड़ते है??
छीनने अपने हिस्से का सूरज
जिसकी रोशनी से
सदा के उजाला भर जाये
कुहरे भरे जीवन में
और नरम धूप भरे
उनकी बर्फीली ठंडी रातों में