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Wednesday, 8 November 2017

आजकल....अमित जैन 'मौलिक'


फ़ितरत बदल रही है मेरे, दिल की आजकल
है कौन जिसकी चल रही है, ख़ूब आजकल।

क्यों आफ़ताब इश्क़, सिखाता है चाँद को
क्यों धूप चांदनी से, मिल रही है आजकल।

दिलशाद वाकये, चमन में फिर से हो रहे
खुश्बू फ़िज़ा में ख़ूब, घुल रही है आजकल।

किसकी हँसी में मिल के, हवा नज़्म हो गई
किसकी ग़ज़ल में शाम, ढल रही है आजकल।

ये कौन चल रहा है मेरे, नाम खार पर 
पाँवों में चुभन तेज, चल रही है आजकल।

शोला फिशां हूँ ख्वाहिशे, आतिश बना गया 
शम्मा सी कोई दिल में, जल रही है आजकल।
- अमित जैन 'मौलिक'

Thursday, 5 October 2017

चंद हाईकू...अमित जैन 'मौलिक'


मौन है हाँ है,
तुम भी तो हो जाओ
ज़ुदा ज़ुबाँ है।

पहले सीखो,
मरना सरल है
जीकर देखो।

पियो पहले,
सारी कड़वाहट 
यूँ कहाँ चले।

यह इल्ज़ाम,
कि बहने न दिया
नदी तो बनो।

अभी तुम हो,
तो बहुत कठिन
हम तो बनो।

गीली मिट्टी हूँ,
पानी नही मिलाओ
मन मिलाओ।

तेरा मेरा क्यों,
सब तो अपना है
रज़ा तो हो।

कहाँ से लाऊँ,
सुकूँ सब्र अब मैं
गुज़र तो हो।

और कितना,
सहता तो आया हूँ
और क्यों सहूँ।
-अमित जैन 'मौलिक'

Sunday, 1 October 2017

धन्यवाद....अमित जैन 'मौलिक'

फिर वही सब याद आ रहा है।
तुम मुझे ग़लत न समझना
मैं करता हूँ कोशिश
तुम्हें भुलाने की,
अब कुछ अहद ही नहीं
तुम्हें आज़माने की।
भुला दूँगा, 
यकीन भी आ रहा है
पर ना जाने क्या बचा है
जो मुझे बहुत सता रहा है

हाँ याद आया!
तुम्हें धन्यवाद कहना है।
क्षमा करना कभी कहा ही नही
अपना पराये का कोई
ख़्याल मन मे रहा ही नहीं
हाँ, मुझे अब 
अपना बर्ताव बदलना है।
बदल लूंगा, 
यकीन भी आ रहा है
पर ना जाने क्या बचा है
जो मुझे बहुत सता रहा है।
-अमित जैन 'मौलिक'

Monday, 25 September 2017

तालीम वहाँ पर सस्ती है....अमित जैन 'मौलिक'


थोडा सा मदहोश हुआ हूँ, थोड़ी काबिज़ मस्ती है।
ना जाने क्यों सारी दुनिया, दीवाने पर हंसती है।

चाँद इन्हीं का तारे इनके, तितली फूल इन्हीं के हैं।
छोड़ो हातिम क्या रक्खा है, बेईमानों की बस्ती है।

जाने दो क्या तलबी करना, उनकी यही रिवायत है।
उनके आगे हम जैसों का, ना कद है न हस्ती है।

चार किताबें पढ़ने वाले, इल्म बाँट कर जाते हैं।
अपनी भी मज़बूरी है, तालीम वहाँ पर सस्ती है।

रोज़ हथेली पर उगते हैं, उनके ख़ुद के सूरज हैं।
मेरे घर की चार खिड़कियाँ, नूर के लिए तरसती हैं।
-अमित जैन 'मौलिक'

Wednesday, 13 September 2017

चलो न वहीं से शुरु करते हैं....अमित जैन 'मौलिक'

अब कभी तेरी बेबसी का, सबब नहीं पूछेंगे
चलो छोड़ो जाने भी दो, अब हम नही रूठेंगे

मेरा ईमान महज़ इसी शर्त पर, मुनहसर नही है
कि जब भी लूटेंगे सिर्फ, चाँद सितारे ही लूटेंगे

चलो न वहीं से शुरु करते हैं, हम हमारे तबसिरे
कि कभी तुम खैरियत लो, कभी हम हाल पूछेंगे

मैं हसरतों के हाथों मज़बूर हूँ, तो क्या हुआ
यकीन कर टूट जायेंगे, मगर वादों से नहीं टूटेंगे
-अमित जैन 'मौलिक'