Thursday, 28 September 2017

नर्म कली बेटियाँ......अनहद गुंजन "गूँज"


(घनाक्षरी)
शब्द-शब्द दर्द हार, सुनो मात ये गुहार,
गर्भ में पुकारती हैं, नर्म कली बेटियाँ॥

रोम-रोम अनुलोम, हो न जाए श्वाँस होम,
टूटे न कभी ये स्वप्न, चुलबुली बेटियाँ॥

सृष्टि-सृजन आधार, कल की छिपी फुहार,
शूल सी नहीं हैं होती, पीर पली बेटियाँ॥

तेरा ही अभिन्न अंग, भरो तो नवीन रंग,
बेटों को है देती जन्म, धीर ढली बेटियाँ॥
-अनहद गुंजन "गूँज"

Monday, 25 September 2017

तालीम वहाँ पर सस्ती है....अमित जैन 'मौलिक'


थोडा सा मदहोश हुआ हूँ, थोड़ी काबिज़ मस्ती है।
ना जाने क्यों सारी दुनिया, दीवाने पर हंसती है।

चाँद इन्हीं का तारे इनके, तितली फूल इन्हीं के हैं।
छोड़ो हातिम क्या रक्खा है, बेईमानों की बस्ती है।

जाने दो क्या तलबी करना, उनकी यही रिवायत है।
उनके आगे हम जैसों का, ना कद है न हस्ती है।

चार किताबें पढ़ने वाले, इल्म बाँट कर जाते हैं।
अपनी भी मज़बूरी है, तालीम वहाँ पर सस्ती है।

रोज़ हथेली पर उगते हैं, उनके ख़ुद के सूरज हैं।
मेरे घर की चार खिड़कियाँ, नूर के लिए तरसती हैं।
-अमित जैन 'मौलिक'

पर परिंदे के फड़फड़ाते है....मनी यादव


अश्क़ जब आँख में आ जाते हैं
हम इक नई  ग़ज़ल सुनाते है

ताइरे दिल बंधा है यादों से
पर परिंदे के फड़फड़ाते है

यूँ कलाई पकड़ तो ली तुमने
शर्म से रोयें मुस्कराते है

बर्क़ की चीख़ सुनके बादल भी
उसके हालात पर रो जाते है

आसमाँ के दरख़्त में तारे
चाँदनी को ग़ज़ल सुनाते है

-मनी यादव

Saturday, 23 September 2017

ख़फ़ा.................अमित जैन ‘मौलिक’

सारा चमन जला बैठे 
वे क्यों ख़फ़ा ख़फा बैठे

देर लगी क्यों आने में 
कब से हम तन्हा बैठे

प्यार से पूछा उसने जो 
सारा हाल सुना बैठे

गज़ब हुआ उस रात को हम 
चाँद को चाँद दिखा बैठे

हंगामा क्यों बरपा है 
जो उसको ख़ुदा बना बैठे

-अमित जैन ‘मौलिक’

Friday, 22 September 2017

उलझन मन की...दूसरा कदम


बैठी थी आज 
लिखने को कुछ 
पर जो कुछ 
कहता था मन मेरा 
और कलम मेरी 
लिखती ही नही.. 
मेरे मन की बात 
करती थी मनमानी 
कलम मेरी..
और तो और..
उँगलियाँ मेरी..
करते करते टाईप 
बहक-बहक सी 
जाती थी.. 
झिड़कने पर 
कहती थी उँगलिया..
जो मेरे मन में आ रही.. 
जा रही उसी अक्षर पर..
तुझे क्या..
रहना सुधारते.. 
बाद टाईप होने के..
करने दे टाईप मुझे ..
मेरे मन की... 
छोड़ दी थक-हारकर 
आधा अधूरा..
बोली अपने आप से...
चलूँ दीदी के पास...
आज दिन तीसरा है 
मातारानी का... 
कर आऊँ दर्शन दीदी के.....
वो भी तो माँ है मेरी..


मेरी हरसत का आइना सवाल करता है....पावनी दीक्षित 'जानिब'

उनके दीदार की उम्मीद बस लगाए हुए 
कब से बैठे हैं उनकी राह में हम आए हुए।

दिल में जलते हुए चरागो को हवा देते है
कि अपनी ज़िद से बैठे हैं शम्आ जलाए हुए ।

मेरी हरसत का आइना सवाल करता है
ये किसका चहरा हैं आप चहरे मे छुपाए हुए ।

हमें खबर है मोहब्बत यहां नहीं मिलती
उम्र गुजरेगी युंही उम्मीद ए दिल लगाए हुए।

रह गुज़र है ये उसकी यहीं मंज़िल भी है
फिर भी गुजरी हैं सदियां उन्हें न आए हुए।

नब्ज थमने लगी है 'जानिब' धुआं सांसे है
फकीरी ज़िंदा है मगर उन पे सब लुटाए हुए ।

-पावनी दीक्षित 'जानिब'

Wednesday, 20 September 2017

दुआ...अमित जैन "मौलिक"


दर्द बढ़ जाए तो बता देना 
इश्क हो जाए तो जता देना ।। 

ज़ख्म भरने लगे सभी मेरे  
आओ आकर कभी हवा देना ।।

कत्ल के बाद भूल मत जाना
चार आँसूं कभी बहा देना ।।

तुम तो माहिर हो झूठ कहने में
फिर बहाना कोई बना देना ।।

तेरे पहलू में मौत आए मुझे
तेरी बाहों का आसरा देना ।।

अब न कोई दवा असर देगी
चंद सांसें है बस दुआ देना ।।

शोर ज्यादा है तेरी गलियों का
आएंगे इक दिन पता देना ।। 

-अमित जैन "मौलिक"