
बैठी थी आज
लिखने को कुछ
पर जो कुछ
कहता था मन मेरा
और कलम मेरी
लिखती ही नही..
मेरे मन की बात
करती थी मनमानी
कलम मेरी..
और तो और..
उँगलियाँ मेरी..
करते करते टाईप
बहक-बहक सी
जाती थी..
झिड़कने पर
कहती थी उँगलिया..
जो मेरे मन में आ रही..
जा रही उसी अक्षर पर..
तुझे क्या..
रहना सुधारते..
बाद टाईप होने के..
करने दे टाईप मुझे ..
मेरे मन की...
छोड़ दी थक-हारकर
आधा अधूरा..
बोली अपने आप से...
चलूँ दीदी के पास...
आज दिन तीसरा है
मातारानी का...
कर आऊँ दर्शन दीदी के.....
वो भी तो माँ है मेरी..