Friday, 20 October 2017
Tuesday, 17 October 2017
कहाँ जा के ठहर जाऊँ मैं....अनिरुद्ध सिन्हा
हर नई रात की आहट से ही डर जाऊँ मैं
सोचता हूँ कि अँधेरों में किधर जाऊँ मैं
धूप की आँच में निकला हूँ सफ़र में साहब
हाथ कुछ आए तो फिर लौट के घर जाऊँ मैं
बाद मुद्दत के मिला है वो मुझे क़िस्मत से
फिर उसी याद के दरिया में उतर जाऊँ मैं
जाने किस मोड़ पे कट जाए ये साँसों की पतंग
किसको मालूम कहाँ जा के ठहर जाऊँ मैं
जिससे नाराज़ बहुत होके रहा मैं तनहा
वो कभी टूट के मिल जाए तो मर जाऊँ मैं
-अनिरुद्ध सिन्हा
Monday, 16 October 2017
दो दिलों के दरमियाँ..........कुंवर बेचैन
दो दिलों के दरमियाँ दीवार-सा अंतर न फेंक
चहचहाती बुलबुलों पर विषबुझे खंजर न फेंक
हो सके तो चल किसी की आरजू के साथ-साथ
मुस्कराती ज़िंदगी पर मौत का मंतर न फेंक
जो धरा से कर रही है कम गगन का फासला
उन उड़ानों पर अंधेरी आँधियों का डर न फेंक
फेंकने ही हैं अगर पत्थर तो पानी पर उछाल
तैरती मछली, मचलती नाव पर पत्थर न फेंक
यह तेरी काँवर नहीं कर्तव्य का अहसास है
अपने कंधे से श्रवण! संबंध का काँवर न फेंक
-कुंवर बेचैन
Sunday, 15 October 2017
महक लुटायेंगे...अमित जैन 'मौलिक'
अब नहीं होती हैं
मुझे गलतफहमियां
अब मुझे दिखने लगी हैं
अपनी भी कमियाँ।
तुम्हारा संग मिला
तो जाना कि जीने का
ढंग किसे कहते हैं
फूल किसे कहते हैं
सुगंध किसे कहते हैं।
तुमने थाम ली उंगली
तो मैं भी चल पड़ा
तुम्हारे साथ।
अपने आपको
तुम्हें सौंप दिया,
तो तुमने भी रोप दिया
मुझे, अपने आसपास ही
उपवन की क्यारी में
अब मैं भी हूँ
महकने की तैयारी में
जब खिल जायेंगे तो
महक लुटायेंगे
और सौभाग्य होगा
तो हम भी,
कभी ना कभी
तुम्हारी तरह
गुलकंद बन जायेंगे।
-अमित जैन 'मौलिक'
Thursday, 12 October 2017
तेरी जुबां पे ना आई मेरी ग़ज़ल....सईद राही

क्या जाने कब कहाँ से चुराई मेरी ग़ज़ल
उस शोख ने मुझी को सुनाई मेरी ग़ज़ल
पूछा जो मैंने उस से के है कौन खुश-नसीब
आँखों से मुस्कुरा के लगाई मेरी ग़ज़ल
एक -एक लफ्ज़ बन के उड़ा था धुंआ -धुंआ
उस ने जो गुनगुना के सुनाई मेरी ग़ज़ल
हर एक शख्स मेरी ग़ज़ल गुनगुनाएं हैं
‘ राही ’ तेरी जुबां पे ना आई मेरी ग़ज़ल
- सईद राही
Tuesday, 10 October 2017
रस्में जहाँ की कोई कैसे अब निभायेगा....नीतू राठौर
पीयोगे कैसे निग़ाहों से पिलाई जाती है
शराब जैसे मैकदों में लुटाई जाती है।
तू होश में भी न पहचान पाई एक हमको
प्यास तो आँखों के प्याली से बुझाई जाती है।
तू रोज-रोज ही कहती पियों न आँखों से
दरिया बनके तू दिल में समाई जाती है।
डूबें है रात से आँखों के तेरे अंजुमन में
ये बातें चाँद-सितारों से छुपाई जाती है।
करो तो साँसों पे एतबार अब नहीं होता
सदाए दिल को धड़कन से सुनाई जाती है।
रस्में जहाँ की कोई कैसे अब निभायेगा
ख़्याल ओ ख़्वाब की दुनिया बसाई जाती है।
हमें तो खुद ही पिलाने यूँ आँखें आई थी
ऐसे ही प्यासे की प्यास "नीतू" बढ़ाई जाती है।
-नीतू राठौर
Sunday, 8 October 2017
यायावर सा सूर्य.....डॉ. इन्दिरा गुप्ता

उदया चल से
अस्ताचल तक
स्वर्ण सूर्य का
गमन गगन !
नील पथ
सिंदूरी आचमन
चलता रथ
सुन चिरई शगुन !
चक्र भ्रमण
करे अनवरत
अष्ट भाव के
रख अश्व संग !
रुके ना पल भर
चले निरंतर
अकिंचन नहीँ
रख प्रयास कंचन !
यायावर सा
द्रुत पथगामी
शनै: शनै:
पूरित कर लंघन !
मलय पवन
शीतल अति चंचल
उष्ण स्वेद बिन्दु
से सिंचित !
चहुं दिशा
हुँकारे पल पल
चलित भाव
रुकना नहीँ सम्भव !
कर्म रथ
हो आरुढित
सम भाव मन
सारथी चुन कर !!
-डॉ. इन्दिरा गुप्ता
साभारः अमित जैन 'मौलिक'
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