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Friday, 20 October 2017

होता है दिल टुकड़े-टुकड़े.....हिया 'हया'

एक पुरानी ग़ज़ल का मतला और कुछ शेर 
कुछ ख़ामोशी जकड़े-जकड़े
कुछ घबराए उखड़े-उखड़े

ख़ूब सताए आज जुदाई
होता है दिल टुकड़े-टुकड़े

सहमा सहमा सारा मौसम
और नज़ारे उजड़े -उजड़े

मोर पपीहा गुमसुम-गुमसुम
कोयल के सुर उखड़े-उखड़े

टीस जिया की दूर करो अब
मत बैठो जी अकड़े-अकड़े
-हिया 'हया'

Tuesday, 10 October 2017

रस्में जहाँ की कोई कैसे अब निभायेगा....नीतू राठौर

पीयोगे कैसे निग़ाहों से पिलाई जाती है
शराब जैसे मैकदों में लुटाई जाती है।

तू होश में भी न पहचान पाई एक हमको
प्यास तो आँखों के प्याली से बुझाई जाती है।

तू रोज-रोज ही कहती पियों न आँखों से
दरिया बनके तू दिल में समाई जाती है।

डूबें है रात से आँखों के तेरे अंजुमन में
ये बातें चाँद-सितारों से छुपाई जाती है।

करो तो साँसों पे एतबार अब नहीं होता
सदाए दिल को धड़कन से सुनाई जाती है।

रस्में जहाँ की कोई कैसे अब निभायेगा
ख़्याल ओ ख़्वाब की दुनिया बसाई जाती है।

हमें तो खुद ही पिलाने यूँ आँखें आई थी
ऐसे ही प्यासे की प्यास "नीतू" बढ़ाई जाती है।
-नीतू राठौर

Tuesday, 12 September 2017

एक दिया दिखा के लूटेगा.....कैलाश झा 'किंकर'

चंद सिक्के थमा के लूटेगा
बात मीठी सुना के लूटेगा

संत-सा लग रहा है ऊपर से
अपने पास बिठा के लूटेगा

कोई पत्थर नहीं पिघलता
उसको ईश्वर बता के लूटेगा

तीरगी को मिटा नहीं सकता
एक दिया दिखा के लूटेगा

है भरोसा मुझे नहीं उसपर
मुझको अपना बना के लूटेगा
-कैलाश झा 'किंकर'

Saturday, 9 September 2017

कहीं कोई पहल नहीं होगी.....अमित 'हर्ष'

कोई सूरत-ए-बदल नहीं होगी 
ये मुश्किल शायद हल नहीं होगी

वाक़िफ़ हैं अंजाम से फिर भी 
कहीं कोई पहल नहीं होगी

न हम तैयार हैं न ये दुनिया ही 
कोई रद्द-ओ-बदल नहीं होगी

आज मुमकिन है जंग पर बहस
ये गुंजाइश मगर कल नहीं होगी

नसीहतें मशवरे सर आँखों पर 
हमसे आपकी नक़ल नहीं होगी

कुछ तुम भी कहो ‘अमित’ से कभी 
ऐसे तो बात मुक़म्मल नहीं होगी

-अमित 'हर्ष'