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Monday, 18 September 2017

रात बितायी भोर की ख़ातिर....कैलाश झा 'किंकर'

"रात बितायी भोर की ख़ातिर
कुछ तो कुछ इंजोर की ख़ातिर

कौन जमा करता है दौलत
दीन-हीन ,कमजोर की ख़ातिर

झगड़ा-झंझट ,खून-खराबा
सब होते बलजोर की ख़ातिर

दूर चले जाते हैं अपने
बस केवल इक ठोर की ख़ातिर

कोई भी इस ओर नहीं है
लोग खड़े उस ओर की ख़ातिर"

-कैलाश झा 'किंकर'

Tuesday, 12 September 2017

एक दिया दिखा के लूटेगा.....कैलाश झा 'किंकर'

चंद सिक्के थमा के लूटेगा
बात मीठी सुना के लूटेगा

संत-सा लग रहा है ऊपर से
अपने पास बिठा के लूटेगा

कोई पत्थर नहीं पिघलता
उसको ईश्वर बता के लूटेगा

तीरगी को मिटा नहीं सकता
एक दिया दिखा के लूटेगा

है भरोसा मुझे नहीं उसपर
मुझको अपना बना के लूटेगा
-कैलाश झा 'किंकर'