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Friday, 15 September 2017

कूड़ा 'औ' कचरा ..


लिखती थी मैं 
कूड़ा 'औ' कचरा 
आती थी बदबू 
दिखाई पड़ती थी 
दिव्या के कूड़ेदान पर,
गलियों के मुक्कड़ में 
भनभनाती थी 
मक्खियाँ 'औ' कुत्तों के झुण्ड 
मंडराते थे कौंवे..
यदा-कदा नज़र आ जाते
सूवर भी
उन्हें नही आती थी 
बदबू और न 
होती थी घिन उन्हें
उस कूड़े से.. 
प्रेमी थे वे कूड़े के 
उसी कूड़े के 
जिसे लिखा था 
मेरी कलम ने 
जिससे आती थी बदबू...
पता नहीं कैसे 
राह बदल गई मेरी 
अब गली के मुक्कड़ 
दिखते हैं 
साफ सुथरे 
किसी ने वहाँ 
कर दी है प्रतिमा स्थापित 
श्री हनुमान जी की....
महका दिया उस जगह को 
ख़ुशबुओं से लोभान के..
अथः  
शुरुआत नई